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रविवार, जनवरी 26, 2014

आलेख:हम भारत के लोग

हम भारत के लोग
भोपाल से प्रकाशित 'स्टार समाचार' में प्रकाशित आलेख

इन दिनों हम भारतीय बहुत मुखर हैं। अभिव्यक्त्ति की आज़ादी लिए लगभग हर एक आवाज़ अपने अधिकारों के लिए जिस साहस का प्रदर्शन कर रही है उसे देखकर यह विश्वास तो दृढ़ होता ही है कि चाहे और कोई आज़ादी मिले न मिले पर बोलने की आज़ादी तो मिल ही गयी है । लेकिन क्या लबों के आज़ाद होने से ही सारी ज़ंजीरें कट जाती हैं या फ़िर लबों को आज़ाद होने का मुगालता देकर सत्ता नए किस्म के ऐसे ग़ुलाम बना लेती है जिनकी आवाज़ तो आज़ाद हो पर बाकी सब कुछ ग़ुलाम।

आज जब हम एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणराज्य के नागरिक होने का जश्न मना  रहे हैं; तब हम भारत के लोग; क्या केवल अपने अधिकार संपन्न स्वरुप पर आत्म मुग्धता का आवरण डाले; अपनी चिर परिचित उत्सव धर्मिता का  निर्वाह करके; फ़िर उसी ढर्रे पर लौट जाएंगे या फ़िर इस बार कुछ सवाल ख़ुद से भी पूछने की ज़रुरत है ? 'हम भारत के लोग ……भारत के संविधान को अंगीकृत,अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।' संविधान की प्रस्तावना में ये शब्द हमें कितना अधिकार संपन्न बनाते हैं और कितना कर्त्तव्य परायण ? क्या हमने कभी सोचा है ?

सोचकर देखिये : क्या संसद और विधान सभाओं में उठते सवाल हमारे सवाल हैं ? क्या सरकारी कार्यालयों में बैठे लोग जन सेवक हैं ? क्या अदालतों में जाते वक़्त हम निर्द्वन्द्व होते हैं ? क्या ख़बरों को परोसता मीडिया हमारी अपनी आवाज़ है ? क्या हमारी पुलिस हमें सुरक्षा देती है ? क्या हमें सामाजिक,आर्थिक और राजनैतिक न्याय मिला ? क्या हमें प्रतिष्ठा और अवसर की समानता मिली ? क्या हम एक राष्ट्र के रूप में अपना वांछित स्थान प्राप्त कर पाये ? क्या एक व्यक्ति अपनी गरिमा के साथ जी पा रहा है ? क्या देश के नागरिकों के बीच बंधुत्व है ? क्या अखंडता और एकता केवल नारों में तब्दील नहीं हो गयी है  ? क्या शिक्षा संस्थान शिक्षा दे रहे हैं ? क्या अस्पतालों में इलाज़ हो रहा है ? क्या हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं ? क्या हमारे प्राकृतिक संसाधन लूट का शिकार नहीं हैं ? क्या धर्म और संस्कृति अब भी हमारी उज्जवल पहचान हैं ? क्या दुनिया को रास्ता दिखाने वाला देश पश्चिम का क्षुद्र पिछलग्गू बन गया है ? क्या-क्या-क्या करते कई सवाल हैं। और यदि पूरे सवाल सामने रखने पड़े तो शायद एक सौ पच्चीस करोड़ सवाल हमारे सामने होंगे।

                      ये एक सौ पच्चीस करोड़ सवाल एक सौ पच्चीस करोड़ भारतवासियों को ही एक सवाल में तब्दील करते हैं। और ये वे भारतवासी हैं जो आजकल बेहद मुखर हैं। संसद से लेकर सड़क तक और पांच सितारा होटलों से लेकर झुग्गी बस्तियों तक आवाज़ें  ही आवाज़ें हैं पर कितनी अज़ीब बात है कि हर आवाज़ बेअसर है, हर आवाज़ नाकाम है, हर आवाज़ खोखली है । पर हम बोल रहें हैं लगातार; बिना यह जाने कि आवाज़ को आज़ाद करके शायद ग़ुलामी की बेड़ियां और ज्यादा मज़बूत कर दी गयीं हैं।ऐसे में इन हालात के लिए किसी को जिम्मेदार ठहरना हो तो ऊंगली उठाकर किसकी ओर इशारा करें ? चलिए निर्णय से पूर्व कुछ दृश्य देखते हैं शायद हमारा काम कुछ आसान हो जाये।

                                                   पहला दृश्य लोकतंत्र के महापर्व चुनाव का है। हम सब अपने प्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं। ऊंचे आदर्शों की बातें हमसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। पर वोट देते समय हम इस बात का पूरा ध्यान रखते हैं कि कौन हमारे स्वार्थों की पूर्ति में सबसे बड़ा सहायक सिद्ध होगा। कौन है जो हमें मुफ्त अनाज,बिजली,पानी,शिक्षा,इलाज़,मनोरंजन, कन्यादान,तीर्थ-यात्रा, पेंशन,मोबाइल, लैपटॉप,स्कूटी आदि अनादि सब दे सकता है। उस पर अगर वो अपने धर्म अपनी जाति का हो तो सोने पे सुहागा। जो जितनी बड़ी खैरात बाटेगा उसकी गद्दी उतनी ही मज़बूत होती चली जायेगी लेकिन ख़ैरात के बदले वोट देते वक़्त क्या हम कभी सोच पाये हैं कि ख़ैरात मांगने वाली आवाज़ें कभी भी अपना हक़ नहीं मांग सकतीं।

                                                                                   दूसरा दृश्य हमारे किसी गाँव,कस्बे,शहर या फ़िर किसी महानगर का है। जहाँ पर दिन-रात भ्रष्टाचार को कोसने वाले 'हम लोग' किसी अति भ्रष्ट नेता,अधिकारी, उद्योगपति,धर्मगुरु,समाजसेवक,पत्रकार,साहित्यकार आदि को प्रथम पूज्य बनाकर धन्य-धन्य हो रहे हैं। ऐसे हर एक महान का आर्थिक रूप से सफल होना या लाभ के पद पर होना उसके भ्रष्ट होने से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है इसलिए जब हम उनका गुण गान करते हैं तो अति उदार हो जाते हैं और ये भी भूल जाते हैं कि चाटुकार आवाज़ों से चरित्र नहीं बना करते।

                    तीसरा दृश्य कहीं का भी हो सकता है। सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति से कतराकर निकलते हम लोगों का, किसी औरत को उसके औरत होने की सज़ा देते हम लोगों का, किसी दलित को अपमानित करते हम लोगों का, बच्चों से उनका बचपन छीनते हम लोगों का, रिश्वत लेते-देते हम लोगों का, मिलावट करते-कम तौलते हम लोगों का, पेड़ काटते,अतिक्रमण करते,हर जगह थूकते-लघु-दीर्घशंका करते, दहेज़ मांगते, बलात्कार करते,बुजुर्गों को निष्कासित-अपमानित करते, नदियों को नालों में बदलते,दंगा करते,लोगों की संपत्ति हड़पते , नियम कानून की धज्जियां उड़ाते, कामचोरी को धर्म मानते हम लोगों का। यह दृश्य कहीं का भी हो सकता है। और वैसे यह सूची बहुत लम्बी हो सकती है लेकिन मैं यहाँ रुककर हमारी आज़ाद आवाज़ों से पूछना चाहता हूँ कि कर्त्तव्यों  की नींव के बिना खड़ी इस आधार विहीन अधिकारों की इमारत में हम कब तक सुरक्षित रह पाएंगे ? क्या हम लोगों की आवाज़ इतना भी नहीं जानती कि झूठी-भ्रष्ट-निकम्मी-पतित-स्वार्थी-बेईमान आवाज़ें अंत में ग़ुलाम हो ही जातीं हैं।

    हम भारत के लोग; इन दिनों बहुत मुखर हम भारत के लोग यह याद रखें कि प्रजातंत्र में जैसी प्रजा होती है वैसे ही प्रतिनिधि चुनती है। यदि हमारे प्रतिनिधि बुरे हैं तो उनका मूल्यांकन करने से पहले हमें आत्म मूल्यांकन करना होगा। आवाज़ों का आज़ाद होना अच्छा है पर कर्त्तव्यनिष्ठा और सत्यनिष्ठा का साथ होगा तो हमारी आवाज़ें बेकार नहीं जाएंगी बल्कि एक सच्चे गणतंत्र का पथ प्रशस्त करेंगी और हम गर्व के साथ कह सकेंगे कि विश्व के सबसे बड़े और सच्चे गणतंत्र के नागरिक हैं हम … हम भारत के लोग।                        

- अशोक जमनानी 
 
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