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मंगलवार, फ़रवरी 11, 2014

कविता : जंग लगे तालों की तरह



कविता : जंग लगे तालों की तरह
 

जंग लगे तालों की तरह भी होती हैं
कुछ कविताएँ
खुल जाएं तो
क्या नहीं दे सकतीं
न खुलें तो
मारते रहिये हथौड़ी
पिलाते रहिये तेल
घुमाते रहिये
चाबियाँ ..........  

- अशोक जमनानी
 
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