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शुक्रवार, नवंबर 21, 2014

नर्मदा यात्रा : 3 : कबीर चबूतरा


नर्मदा यात्रा : 3 : कबीर चबूतरा 





अमरकंटक ऐसा स्थान है जहाँ विंध्याचल और सतपुड़ा का मिलन होता हैं। लेकिन नर्मदा का उद्गम होता है दोनों के मध्य स्थित मेकल पर्वत से इसीलिए नर्मदा मेकलसुता है। तुलसी बाबा ने मानस में नर्मदा को मेकल शैलसुता कहा। मेकल एक बहुत छोटी पर्वत  श्रृंखला है और दमगढ़ के पास इसका विस्तार समाप्त हो जाता है।  नर्मदा के किनारे-किनारे चलें तो कपिलधारा से नीचे उतरकर दमगढ़ आ सकते हैं लेकिन सड़क के रास्ते आना हो तो कबीर चबूतरा मार्ग में ही है।  यहाँ नर्मदा का किनारा तो नहीं है लेकिन कबीर यहाँ कुछ दिन यहाँ रुके थे इसलिए यहाँ एक वट वृक्ष , कुटिया और चबूतरा लोगों की आस्था के केंद्र हैं। एक छोटा-सा कुण्ड भी है जिसके साफ़ पानी में सुबह सुबह एक दूधिया धारा प्रकट होती है और कुण्ड के जल को भी दूधिया कर देती है फिर सूरज ऊपर उठता है तो दूधिया धारा लुप्त हो जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ठण्ड के  कारण कुछ रासायनिक परिवर्तन नीचे की चट्टानों में होते हैं  जिसके कारण यह  सफ़ेद धारा  बाहर आती है और  धूप बढ़ने पर समाप्त हो जाती है लेकिन भक्तों को इन बातों पर खास भरोसा नहीं है वे तो इसे चमत्कार ही मानते हैं। अब भक्त तो भक्त  ठहरे कुटिया में कबीर की तस्वीर की पूजा भी होती है और पत्थर की पूजा से चक्की को बेहतर मानने वाले कबीर की कुटिया में चक्की का एक पाट भी है जिस पर  भक्तगण अगरबत्ती जलाते हैं …… वैसे भी हम हिन्दुस्तानियों की यह उपलब्धि छोटी नहीं मानी जायेगी कि हमने चक्की चलायी नहीं तो क्या हुआ उसे अगरबत्ती स्टैंड तो बना ही दिया !  ……   कबीर साहेब बंदगी  …   अशोक जमनानी 
 
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