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मंगलवार, दिसंबर 02, 2014

नर्मदा यात्रा : 11 : जोगी टिकरिया






नर्मदा यात्रा : 11 : जोगी टिकरिया




















डिण्डोरी पीछे छूटता है तो एक छोटा सा गांव आता है - जोगी टिकरिया। यह नर्मदा के उत्तर तट पर है। कुछ दिन पूर्व मैंने यहाँ रह रहे  कोमलदास बाबा के बारे में लिखा था जो प्रतिदिन 12 घंटे घाटों की सफाई करते हैं और इसे ही भजन मानते हैं। उनके श्रम को नमन करता हूँ तो सोचता हूँ कि क्यों हमारे देश का श्रम से रिश्ता कमज़ोर हो रहा है ? फिर नर्मदा की ओर देखता हूँ तो  नर्मदा के जन्म की कहानी याद आती है। भगवान शंकर ने माँ पार्वती के साथ मिलकर कठिन तप किया और उनके कठिन तप के कारण जो पसीने की बूंद उनके माथे से गिरी वो नर्मदा बन गयी। कुछ वर्ष पूर्व मैंने एक उपन्यास लिखा था 'छपाक-छपाक' उसमें  इस कहानी को कुछ इस तरह लिखा था  .......
नर्मदा पहचानती है
पसीने की हर एक बूँद को
वो शिव के माथे से गिरी
पसीने की एक बूँद ही थी
जो नदी बन गयी
जो नर्मदा बन गयी  .......




- अशोक जमनानी 

 
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