Loading...
शुक्रवार, दिसंबर 12, 2014

नर्मदा यात्रा : 12 : शाल वन






नर्मदा यात्रा : 12 : शाल वन



















जोगी टिकरिया से आगे बढ़ें उससे पहले शाल वनों  के बारे में भी बात करना बहुत ज़रूरी है। नर्मदा का शाल वनों से गहरा रिश्ता है। नर्मदा किसी ग्लेशियर से नहीं निकलती इसलिए वनों के अस्तित्व से नर्मदा का गहरा संबंध है। शाल के वृक्ष लगभग पूरे वर्ष हरे रहते हैं और इन वृक्षों की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये वर्षा के जल को सहेजकर रखते हैं और धीरे-धीरे यह जल नर्मदा  में पहुंचता है।  सम्पूर्ण नर्मदा घाटी की संरचना ऐसी है कि जंगल इसे सदानीरा बनाए रखते हैं और इस प्रक्रिया में शाल  वृक्ष सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। लेकिन अब अधिकांश शाल वन नष्ट हो चुके हैं और जो बचे हैं वे भी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। कुछ  दशक पूर्व इन जंगलों को षड़यंत्र पूर्वक नष्ट किया गया। शाल को काटकर सागवान ( सागौन ) का रोपण इसलिए किया गया क्योंकि सागवान 20 वर्ष में बड़ा हो जाता है लेकिन शाल को बड़ा होने में 50 वर्ष लगते हैं मतलब साफ़ था जितनी बार पेड़ बढ़ेंगे उतनी बार उन्हें काटा जा सकेगा। इसके विरोध में झारखण्ड में आदिवासियों ने बड़ा आंदोलन भी किया लेकिन शाल वन नहीं बचे। शाल वनों के नष्ट होने का अर्थ है नर्मदा के अस्तित्व पर संकट। आज नर्मदा में पानी है पर प्रवाह नहीं है तो उसका  कारण शाल वनों अंत से जुड़ता है। रही बात सरकारों की तो एक उदाहरण हमारी सरकारों की चेतना का चेहरा ठीक से दिखायेगा - शाल वन वर्षा के जल को लम्बे समय तक सहेजकर रखते हैं इसलिए आस-पास की ज़मीन दलदल नुमा होती है। कुछ दशक पूर्व कागज़ बनाने वाले उद्योगपतियों ने सरकार को सुझाव दिया कि बड़े पैमाने पर यूकेलिप्टस  के पेड़ इन वनों में लगाए जाएं फ़ायदा यह समझाया कि दलदल भी ख़त्म होगा क्योंकि यूकेलिप्टिस बहुत तेज़ी से भूमिगत जल को सोखते हैं और  बहुत तेज़ी से बढ़ने वाले पेड़ उद्योगों को कच्चा माल भी दे सकेंगे। सरकार ने बात मानी और  बड़े पैमाने पर यूकेलिप्टिस लगाए गए परिणाम यह हुआ कि उन्होंने दलदल के साथ शाल वनों को भी सुखा दिया   और नर्मदा का प्रवाह सरकारों की समझदारी का ख़ामियाजा आज तक भुगत रहा है ……   


-अशोक जमनानी          

 
TOP