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शनिवार, दिसंबर 20, 2014

नर्मदा यात्रा : 18 : लिंगा- मानोट


नर्मदा यात्रा : 18 : लिंगा-  मानोट 



यात्रा आगे बढ़ती है तो उत्तर तट पर दो गाँव कुछ देर रोकते हैं। लिंगा और  मानोट। यहाँ से मंडला बहुत दूर नहीं है और कभी इस पथ पर लोक संगीत की गूंज रास्ता रोक लिया करती  थी लेकिन अब छोटे-छोटे गाँवों में भी फिल्मों के गीत गूंजते हैं। कल जी ने कहा कि इस अंचल के लोक संगीत के बारे में लिखूं तो लगा कि विकास के पथ पर चलते-चलते जो बहुत हद तक खो गया उस संगीत पर क्या लिखूं ? वैसे खोने के इस दौर में कुछ बचा हुआ भी है लेकिन अब वो सामने आने के लिए अवसर तलाशता है। लोक संगीत अब जीवन का हिस्सा नहीं है अब वो उत्सव का अंग है। कभी इस क्षेत्र में  सैला, रीना, करमा , अहीरी नृत्य नर्मदा के साथ-साथ हमेशा थिरकते थे। अब वे पाँव अवसर तलाशते हैं लेकिन जब अवसर आता है तो पुरुषों के 'सैला' के साथ थाली बजाती महिलाओं का 'रीना' भी कहाँ रुकता है और रीना में गूंज उठते हैं नदियों के गीत, जो गाते हैं  ……

री रीना रीना झेला नदिया
नदिया मा  हवय गये किलोल
किलोल झेला नदिया
नदिया माँ हवय गये किलोल
री रीना रीना झेला नदिया  …

मनुष्य चाहे भूल जाये पर रीना के गीत नदियों की किलोल गायेगी , नर्मदा गायेगी  … हमेशा- हमेशा  

- अशोक जमनानी      
 
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