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गुरुवार, दिसंबर 25, 2014

नर्मदा यात्रा : 24 : सहस्त्रधारा


नर्मदा यात्रा : 24 : सहस्त्रधारा 










मंडला से चलकर हम सहस्त्रधारा की ओर बढ़ें उससे पहले मंडला के माहिष्मती होने न होने पर भी कुछ बात करते चलें। प्राचीन नगरी माहिष्मती महेश्वर थी या मंडला  इस बात पर विद्वानों में विवाद है। दोनों के पास अपने-अपने  तर्क हैं लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि मध्यप्रदेश का इतिहास लेखन अभी भी शैशव काल में ही है।  शायद कभी कुछ गंभीर शोध सारे विवादों का अंत कर सके । लेकिन हमें तो  सहस्त्रधारा के बारे में कुछ बात  करनी है और  यह भी संयोग ही है कि सहस्त्रधारा मंडला और महेश्वर दोनों के पास है और दोनों ही अपने सबसे बुरे दिनों से गुज़र रही हैं। सहस्त्रधारा के पास ही सहस्त्रबाहु और रावण का युद्ध हुआ था जिसमें रावण पराजित होकर बंदी बना और पुलस्त्य मुनि के कहने पर मुक्त हुआ। सहस्त्रबाहु हैहय वंश का सबसे प्रतापी राजा था। हैहय शब्द अहि हय का अपभ्रंश है । इन्हीं सहस्त्रबाहु से कलचुरि राजवंश का आरंभ होता है जो मध्य भारत के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है इसके बारे में कुछ और बात हम भेड़ाघाट पहुंचकर करेंगे । अभी तो हम सहस्त्रधारा के खो चुके सौंदर्य की कल्पना करें क्योंकि जहाँ सहस्त्रधारा है वहां काली चट्टानों के मध्य नर्मदा की एक दुर्बल धारा बह रही थी लेकिन चंद क़दमों की दूरी पर थी विपुल जलराशि। यह अद्भुत दृश्य था एक ही स्थान पर एक ओर नर्मदा की क्षीण धारा और दूसरी ओर विपुल जलराशि। असल में यहाँ से बरगी बांध का जल संग्रहण क्षेत्र शुरू होता है और यहीं से नर्मदा नदी के स्थान पर झील बनना आरम्भ होती है  जिसके बारे में हम कल बातें करेंगे। अभी तो हम सहस्त्रधारा के बदले हुए रूप को देखें जिसके मूल रूप को देखकर रावण ने कहा था - अरे, यह तो गंगा है  .......

- अशोक जमनानी   
 
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