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शनिवार, जनवरी 03, 2015

नर्मदा यात्रा : 32 : एक कविता बरगी से

नर्मदा यात्रा : 32 : एक कविता बरगी से 






नर्मदा
तुम्हें निहारने के लिए
पूरे चाँद वाली रात में
मैंने चाँद बोया
बरगी के आसमान में

जैसे ज़िद करने पर अम्मा
रख देती थी सिक्के
मेरी हथेली पर
अपने आँचल के सिरे की
गांठें  खोलकर
वैसे ही तुमने अपने
फैले आँचल के सिरे पे बंधे
किनारे रख दिए
मेरी हथेली पर

कहती थी अम्मा
सिक्के
खर्च करना सोच समझकर
तुमने भी कहा शायद मन ही मन
किनारे
खर्च करना सोच समझकर


पर कब सुनी बात
बचपन ने सयानी कोई 
हमेशा की तरह मैं
रंग बिरंगी चीज़ों पर
कर दूंगा खर्च सब कुछ
फिर लौटकर
गोद में तुम्हारी
रखकर सर
चाहूंगा
तुम सुनाओ लोरी
या कोई कहानी
नई पुरानी

ताकि मैं मूंदकर आँखें अपनी
देख सकूं तुम्हें सपनों में भी
पूरे चाँद वाली रात में
इसीलिए चाँद बोया है मैंने
बरगी के आसमान में
नर्मदा  … माँ  …

 - अशोक जमनानी




 

 

 
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