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सोमवार, जनवरी 16, 2017

उपन्यास अंश : छपाक-छपाक



मित्र हृदयेश ने पुल के पास बहती नर्मदा का सुंदर चित्र भेजा है . कभी इसी दृश्य को अपने उपन्यास छपाक छपाक में उकेरा था . वही उपन्यास अंश और हृदयेश जी का भेजा चित्र ...
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नर्मदा पुल के पास न जाने कैसे कैसे रूप धरती है .
कहीं देखो तो ऐसी शांत जैसे सौ-सौ सुखों में पली देह को हर राग से वैराग्य हो गया हो ,
कहीं पत्थरों पर ऐसी अल्हड़ बन कूदती है जैसे बचपन के पांव थोड़े से बड़े होते ही ख़ुद को रोक न पा रहे हों .
कहीं धार ऐसी तेज़ चलती है जैसे कर्म के प्रेम में पागल कोई सोचे कि वो न भागे तो संसार ही रुक जायेगा .
कहीं-कहीं नर्मदा ने छोटे-छोटे डबरों में भी डेरा डाला है . क्या करे ? डबरों के उलहाने भी कम नहीं थे .
नर्मदा से कहते - तुम्हारा वैभव इतना बड़ा और हम ठहरे ग़रीब !
नर्मदा ने उनका मन भी रख लिया है और उन्हें इतना भर दिया है कि थोड़ा सा जतन करेंगे तो बहती धार से एकाकार हो जाएंगे .
इतने रूप हैं नर्मदा के लेकिन एक रूप और भी है . पानी जहां गहरा है प्रवाह वहां ठहरा-सा है , क्यों ? कोई कहां जानता है ! कहते हैं गहरे जल में नर्मदा चिंतन करती है या शायद चिंता भी करती है .
नर्मदा जब देखती है कि उसके किनारों पर लुटेरों के डेरे बढ़ते ही जा रहे हैं तो वो गहरे जल में ठहर सी जाती है . वो सोचती है कि इस गहरायी में पूरी धारा को समेटकर पाताल में छुप जाये और जब लालची लुटेरों के डेरे किनारों से उठ जाएं तब वो लौटे .
लेकिन नर्मदा पाताल में कैसे जाये वो तो वहां जाती है जहां सूरज जाता है ,
पूरब से चलते-चलते पश्चिम के परकोटे में ..... - अशोक जमनानी
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